Tue. Oct 20th, 2020

पत्रकारिता : “हाल अपना क्या बताएं संकटों को क्यों चुना है। ताज पहना है जो हमने कंटको से वह बुना है”

पत्रकारिता : “हाल अपना क्या बताएं संकटों को क्यों चुना है। ताज पहना है जो हमने कंटको से वह बुना है”पत्रकारिता कांटों का ताज।
यह दिवस मुबारक हो आज।।
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हाल अपना क्या बताएं संकटों को क्यों चुना है।
ताज पहना है जो हमने कंटको से वह बुना है।

तीनों पहिये व्यवस्था के छोड़ते कर्तव्य पथ जब
जंग छिड़ती तब कलम की असर भी तो 100 गुना है।

हाल ही अपना क्या बताएं संकटों को क्यों चुना है।
ताज पहना है जो हमने कंटको से वह बुना है।

भ्रष्टता बगुलो कि जब भी छापते हैं मित्रवर
मिर्च सा होता असर है चमचा भी तो अनमना है।

हाल अपना क्या बताएं संकटों को क्यों चुना है।
ताज पहना है जो हमने कंटकों से वह बुना है।

चोरी अपराधी लुटेरे या पुलिस की फौज हो
सत्य पढ़कर खफा होते धमकियों का डर घना है।

हाल अपना क्या बताएं संकटों को क्यों चुना है।
ताज पहना है जो हमने कंटको से वह बुना है।।

एकता नाराज हमसे हो गई क्यों आजकल
सत्यता का हो ना खंडन यही मन में डर बना है।

स्वर्ग से भाई अवस्थी दे रहे आवाज़ हैं
बने ना नीलू कोई भी एक होना अब पुनः है।

हाल अपना क्या बताएं संकटों को क्यों चुना है।
ताज पहना है जो हमने कंटकों से वह बुना है।।

जिनकी खातिर था लगाया कैरियर भी दांव पर
वे लिखाते सीखते हम, पैसा शोहरत सब मना है।

हाल अपना क्या बताएं संकटों को क्यों चुना है।
ताज पहना है जो हमने कंटको से वह बुना है।।

बढ़ गया है इतना शोषण पेशे में हम क्या कहें
डाकुओं सा नजर आता चीफ व्यूरो जो बना है।।

हाल अपना क्या बताएं संकटों को क्यों चुना है।
ताज पहना है जो हमने कंटको से वह बुना है।।

कोई चावल मांगता है कोई कहता “वन” घना है।

कह रहे “चूका” घुमाओ, मना कर दो अनमना है।

हाल अपना क्या बताएं संकटों को क्यों चुना है।

ताज पहना है जो हमने कंटकों से वह बुना है।।

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